रोपड़, 16 अप्रैल: सामाजिक न्याय के पुरोधा महात्मा जोतिराव फुले और डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर आईआईटी रोपड़ में आयोजित “रूट्स ऑफ रिवॉल्यूशन” संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार व डीएनएन हिंदी के प्रधान संपादक वैभव कुमार ने मुख्य वक्ता के रूप में ऐतिहासिक और विचारोत्तेजक संबोधन दिया। उन्होंने अंबेडकर को केवल जाति उन्मूलन तक सीमित करने वाली धारणाओं को चुनौती देते हुए उनके बहुआयामी योगदानों पर प्रकाश डाला।
छात्रों, शिक्षकों और अंबेडकरवादी चिंतकों से भरे सभागार में कुमार ने कहा, “अंबेडकर केवल संविधान निर्माता नहीं थे, वे आधुनिक भारत की आर्थिक, ऊर्जा, जल प्रबंधन और महिला अधिकारों की आधारशिला रखने वाले दूरदृष्टा थे।” उन्होंने दमोदर घाटी परियोजना, भाखड़ा-नांगल बांध, राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं के निर्माण में अंबेडकर की अग्रणी भूमिका का हवाला दिया।
अपने संबोधन में वैभव कुमार ने हाल ही में जेएनयू के प्रख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर विवेक कुमार के साथ रिकॉर्ड किए गए पॉडकास्ट का उल्लेख किया, जिसमें ‘डेकोडिंग अंबेडकर’ नामक उनकी किताब पर विस्तृत चर्चा की गई थी। इसी संदर्भ में उन्होंने प्रोफेसर विवेक कुमार की पुस्तक को उद्धृत करते हुए बताया कि कैसे अंबेडकर की बौद्धिक और संस्थागत विरासत को योजनाबद्ध रूप से दबाने की कोशिशें की गईं। उन्होंने कहा, “यह किताब अंबेडकर के विचारों और कार्यों की एक ऑडियो-विजुअल पुनर्रचना है, जो उन्हें भारत की लोकतांत्रिक आत्मा के रूप में पुनर्स्थापित करती है।”

कुमार ने प्रो विवेक कुमार की किताब से हवाला देते हुए यह भी बताया कि अंबेडकर ने समान वेतन, मातृत्व लाभ और पिछड़े वर्गों के लिए राज्य प्रायोजित शिक्षा जैसी नीतियों का मसौदा तैयार किया। उन्होंने अरुण शौरी जैसे आलोचकों के झूठे दावों को खारिज करते हुए यह बताया कि कैसे फिल्मों (गांधी, 1982) और उपन्यासों (मुल्कराज आनंद का अछूत) में अंबेडकर की उपेक्षा की गई है, जबकि अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने 1962 में उन्हें “मानव अधिकारों के महान योद्धा और समाज सुधारक” की उपाधि से सम्मानित किया था।
उन्होंने एडविना माउंटबेटन के निजी पत्रों का उल्लेख करते हुए कहा, “अंबेडकर ही वह एकमात्र प्रतिभा थे जो हर जाति और वर्ग को न्याय दे सकते थे।”
अपने भाषण के अंत में उन्होंने कहा, “अंबेडकर को समझना आधुनिक भारत की आत्मा को समझना है। जब तक हम उन्हें उनके संपूर्ण बौद्धिक और संस्थागत स्वरूप में नहीं स्वीकारेंगे, तब तक भारत में लोकतंत्र अधूरा रहेगा।”
आईआईटी रोपड़ की सोशल जस्टिस सेल द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में छात्रों के शोधपत्रों और पैनल चर्चाओं के माध्यम से फुले और अंबेडकर के समतावादी विचारों को युवा वर्ग के बीच पहुंचाने का प्रयास किया गया।

