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Home » निजीकरण को झटका: यूपी नियामक आयोग की ग्रांट थॉर्नटन से बैठक रद्द, उपभोक्ता परिषद की बड़ी जीत
उत्तर प्रदेश

निजीकरण को झटका: यूपी नियामक आयोग की ग्रांट थॉर्नटन से बैठक रद्द, उपभोक्ता परिषद की बड़ी जीत

उपभोक्ता परिषद के विरोध के बाद बड़ा झटका, असंवैधानिक नियुक्त कंसल्टेंट को संरक्षण देने का आरोप
DNN हिन्दीBy DNN हिन्दीMay 2, 2025Updated:May 2, 20254 Mins Read
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उपभोक्ता परिषद के विरोध के बाद बड़ा झटका, असंवैधानिक नियुक्त कंसल्टेंट को संरक्षण देने का आरोप
उपभोक्ता परिषद के विरोध के बाद बड़ा झटका, असंवैधानिक नियुक्त कंसल्टेंट को संरक्षण देने का आरोप
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मुख्य बिंदु:

  • नियामक आयोग की ग्रांट थॉर्नटन से 2 मई की प्रस्तावित बैठक रद्द
  • उपभोक्ता परिषद ने उठाया संवैधानिक प्रक्रिया के उल्लंघन का सवाल
  • आयोग को निजीकरण की कोई आधिकारिक सूचना नहीं — न सरकार से, न पावर कॉरपोरेशन से
  • अमेरिका में दंडित और विवादित ग्रांट थॉर्नटन को पावर कॉरपोरेशन दे रहा संरक्षण
  • परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के शिवकुमार चड्ढा बनाम म्युनिसिपल कॉरपोरेशन आदेश का हवाला दिया

विस्तृत रिपोर्ट:

उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के विरोध और संवैधानिक आपत्ति के बाद, विद्युत नियामक आयोग ने 2 मई को ग्रांट थॉर्नटन कंसल्टेंसी कंपनी के साथ प्रस्तावित बैठक को रद्द कर दिया है। यह बैठक दक्षिणांचल और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगमों के संभावित निजीकरण पर केंद्रित थी, जिसे लेकर लंबे समय से विरोध हो रहा है।

इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष और राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने आज आयोग के सदस्य श्री संजय कुमार सिंह से मुलाकात कर एक लोकमहत्व प्रस्ताव सौंपा। इस प्रस्ताव में उन्होंने बैठक को संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन बताया और कहा कि यह नियामक आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था के अधिकारों पर कुठाराघात है।


परिषद की प्रमुख आपत्तियां:

अवधेश कुमार वर्मा ने अपने प्रस्ताव में कहा कि:

  • विद्युत नियामक आयोग एक स्वतंत्र न्यायिक संस्था है, जो कोर्ट की तरह काम करती है। ऐसे में किसी एक पक्ष — जैसे ग्रांट थॉर्नटन — से एकतरफा बैठक करना “Ex-Parte Communication” के दायरे में आता है।
  • सुप्रीम कोर्ट के शिव कुमार चड्ढा वर्सेस म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि न्यायिक संस्थाएं किसी एक पक्ष से अलग से संपर्क नहीं कर सकतीं, विशेषकर जब विवाद लंबित हो।
  • ग्रांट थॉर्नटन द्वारा आयोग को यह बताना कि दक्षिणांचल और पूर्वांचल का निजीकरण हो रहा है, जबकि आयोग को इस बारे में सरकार या पावर कॉरपोरेशन की तरफ से कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी गई, यह स्वयं में रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का उल्लंघन है।

असंवैधानिक कंसल्टेंसी और फर्जी हलफनामा:

परिषद ने यह भी आरोप लगाया कि:

  • ग्रांट थॉर्नटन को असंवैधानिक रूप से नियुक्त किया गया है।
  • यह कंपनी अमेरिका में रेगुलेटरी उल्लंघन के कारण जुर्माना भुगत चुकी है, जिसकी जानकारी छिपाकर भारत में झूठा शपथ पत्र दाखिल किया गया।
  • इसके बावजूद, पावर कॉरपोरेशन इस कंपनी को बचाने का हरसंभव प्रयास कर रहा है — उसकी मीटिंग आयोग से फिक्स कराना इसी कड़ी का हिस्सा था।
  • परिषद का कहना है कि इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर उसकी बैंक गारंटी ज़ब्त, और प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए थी, लेकिन इसके उलट उसे संरक्षित किया जा रहा है।

निजीकरण की प्रक्रिया पर सवाल:

परिषद ने यह भी बताया कि:

  • आयोग को अब तक यह जानकारी तक नहीं दी गई कि दक्षिणांचल और पूर्वांचल का निजीकरण किया जा रहा है, जबकि दोनों कंपनियों की वर्ष 2025-26 की वार्षिक राजस्व आवश्यकता (ARR) पहले ही दाखिल हो चुकी है।
  • अब एक बाहरी कंसल्टेंसी कंपनी — ग्रांट थॉर्नटन — खुद आयोग को पत्र लिखकर निजीकरण की बात कर रही है और “क्रिटिकल इश्यू” पर मीटिंग मांग रही है।
  • यह दर्शाता है कि पावर कॉरपोरेशन खुद पीछे हटकर कंसल्टेंट को आगे कर रहा है, ताकि निजीकरण की प्रक्रिया को आयोग की सहमति का आवरण मिल सके।

जनहित और नियामक इतिहास में बड़ी घटना:

अवधेश वर्मा ने कहा कि यह पहली बार है जब रेगुलेटरी इतिहास में एक वितरण लाइसेंस जारी करने वाली संस्था — विद्युत नियामक आयोग — को एक बाहरी कंपनी यह सूचना दे रही है कि लाइसेंसधारी कंपनियों का निजीकरण हो रहा है।

यह दर्शाता है कि किस प्रकार संवैधानिक संस्थाओं को बाईपास करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने मांग की कि आयोग पावर कॉरपोरेशन के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे, जो एक असंवैधानिक कंसल्टेंट की पैरवी कर रहा है।


पहले से लंबित जनहित प्रस्ताव:

परिषद ने यह भी अवगत कराया कि निजीकरण से जुड़े मामलों पर आधा दर्जन से अधिक लोकमहत्व प्रस्ताव आयोग के समक्ष पहले से ही लंबित हैं। ऐसे में एकतरफा बैठकों की प्रक्रिया न केवल जनविरोधी है, बल्कि न्यायिक नैतिकता के भी विरुद्ध है।


निष्कर्ष:

इस घटनाक्रम को निजीकरण प्रक्रिया पर बड़ा झटका और उपभोक्ता हितों की बड़ी जीत माना जा रहा है। यह मामला स्पष्ट करता है कि संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता और स्वतंत्रता को बनाए रखना कितना आवश्यक है। परिषद ने संकेत दिए हैं कि यदि आयोग ने इस मामले में कठोर रुख नहीं अपनाया, तो वह विधिक और जनांदोलनात्मक दोनों स्तरों पर संघर्ष जारी रखेगी।

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