लखनऊ स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में दलित पीएचडी शोधार्थी बसंत कुमार कनौजिया 18 दिनों से लगातार धरने पर बैठे हैं। वह विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अपने निलंबन के विरोध में खुले आसमान के नीचे न्याय की मांग कर रहे हैं। शोधार्थी का आरोप है कि यह निलंबन न केवल प्रशासनिक दमन का उदाहरण है बल्कि दलित छात्रों के खिलाफ बढ़ते संस्थागत भेदभाव और उत्पीड़न का ताज़ा उदाहरण भी है।
शोधार्थी का आरोप: विवि प्रशासन मनमानी कर रहा, कोई सुनवाई नहीं
बसंत कुमार कनौजिया का कहना है कि विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन उनके साथ लगातार भेदभावपूर्ण व्यवहार करता रहा है। उनका आरोप है कि जिस घटना को आधार बनाकर उन्हें निलंबित किया गया, वह न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है बल्कि विभागीय स्तर पर उनसे कभी कोई लिखित सफाई तक नहीं माँगी गई। वसंत के अनुसार, विश्वविद्यालय ने निलंबन का आदेश बिना जाँच, बिना समिति और बिना प्रक्रिया के जारी कर दिया, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है।
घर से विश्वविद्यालय तक: संघर्ष का बढ़ता दायरा
बसंत कुमार कनौजिया एक सामाजिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आते हैं। उनका कहना है कि परिवार में पढ़ाई का माहौल नहीं था, लेकिन उन्होंने मेहनत करके पीएचडी तक का सफर तय किया। इस सफर में तमाम सामाजिक-आर्थिक बाधाएँ भी थीं, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दिया गया निलंबन उन्हें सबसे अधिक पीड़ादायक लगा। वह कहते हैं कि यह सिर्फ व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, बल्कि ऐसा संघर्ष है जिसे हर वह दलित-अनुसूचित छात्र झेलता है, जो उच्च शिक्षा में अपनी जगह बनाना चाहता है।
सवाल-जवाब में वसंत कुमार का पक्ष: विश्वविद्यालय की प्रक्रियाएँ संदिग्ध
हमारी बातचीत में बसंत कुमार कनौजिया ने स्पष्ट कहा कि विश्वविद्यालय की निलंबन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने किसी विधिवत जांच समिति का गठन नहीं किया, न ही उनके पक्ष को दर्ज किया। उन्होंने यह भी कहा कि निलंबन की नोटिस में जो तथ्य लिखे हैं, वे वास्तविक घटनाओं से मेल नहीं खाते। वसंत का दावा है कि प्रशासन ने विभागीय स्तर पर उठाए गए सवालों और शिक्षक-छात्र संबंधों से जुड़े तनाव को छिपाने के लिए जल्दबाज़ी में उन्हें दोषी ठहराया।
मनोवैज्ञानिक असर: अवसाद, चिंता और भविष्य की अनिश्चितता
बसंत ने बताया कि इस पूरे विवाद ने उनकी मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डाला है। उन्होंने स्वीकार किया कि वे अवसाद की कगार पर पहुँच गए थे और जीवन को लेकर कई बार असहाय महसूस किया। उनका कहना है कि वे कई रातों तक सो नहीं पाए और यह डर बना रहा कि कहीं उनके शोध का भविष्य समाप्त न हो जाए। इस मानसिक दबाव के बावजूद उन्होंने धरना जारी रखने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि वे पीछे हटे तो आने वाले दलित छात्रों के साथ भी यही होगा।
दोस्तों और शोधार्थियों का समर्थन, लेकिन विवि प्रशासन मौन
बसंत को विश्वविद्यालय के कुछ शोधार्थियों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों का समर्थन मिल रहा है। छात्र हर दिन धरने पर आकर उनसे बातचीत करते हैं और उनकी मांगों के समर्थन में आवाज़ उठा रहे हैं। इसके विपरीत, विश्वविद्यालय प्रशासन लगातार चुप्पी साधे हुए है। कई बार नोटिस भेजने और आवेदन देने के बावजूद न तो कुलपति और न ही विभागाध्यक्ष ने उनसे मिलने की कोशिश की है।
शोध और करियर पर खतरा: दो साल की मेहनत दाँव पर
बसंत कुमार का कहना है कि उनका शोधकार्य लगभग अंतिम चरण में है। उन्होंने दो साल लगातार फील्डवर्क किया, डेटा एकत्र किया और कई अध्याय लिखे, लेकिन निलंबन के कारण वे सबमिशन नहीं कर पा रहे। उन्हें डर है कि यदि यह विवाद लंबा खिंच गया तो विश्वविद्यालय उन्हें निष्कासित भी कर सकता है। वह कहते हैं कि एक सामान्य दलित छात्र के लिए पीएचडी का रास्ता पहले ही कठिन होता है और ऐसी मनमानी कार्रवाई उस संघर्ष को कई गुना बढ़ा देती है।
न्याय की माँग: निलंबन वापसी और निष्पक्ष जांच
बसंत कुमार कनौजिया ने स्पष्ट माँग रखी है कि विश्वविद्यालय प्रशासन निलंबन को तुरंत वापस ले और इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए। उनका कहना है कि अगर प्रशासन सही है तो उसे पारदर्शिता से डरना नहीं चाहिए। वह चाहते हैं कि जांच समिति में विश्वविद्यालय के बाहर के सदस्य भी हों ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके। वे धरना समाप्त करने को तैयार हैं, लेकिन केवल तब जब दंडात्मक कार्रवाई के बजाय न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जाए।
संस्थागत भेदभाव का बड़ा सवाल
बसंत कुमार का संघर्ष व्यक्तिगत स्तर से आगे बढ़कर संस्थागत भेदभाव के बड़े प्रश्न की तरह सामने आया है। यह मुद्दा इस बात को रेखांकित करता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित-अनुसूचित छात्रों के खिलाफ कितनी बार नियमों को मोड़ा जाता है और किस तरह प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल एकतरफा तरीके से किया जाता है। उनके मामले ने विश्वविद्यालयों में बराबरी, सुरक्षा, संवैधानिक अधिकारों और शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही की बहस को नए सिरे से जीवित कर दिया है।
संघर्ष जारी, समाधान अभी धुंधला
धरना 20वें दिन में प्रवेश कर चुका है और बसंत कुमार अभी भी उन्हीं मांगों पर डटे हुए हैं जिनकी अनदेखी विश्वविद्यालय कर रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में असमानता और भेदभाव के खिलाफ यह संघर्ष सिर्फ एक छात्र का नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक परिघटना का हिस्सा बन चुका है।बसंत कुमार कनौजिया का कहना है कि यह लड़ाई उनकी डिग्री की नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान की है — और वह इसे अंतिम परिणाम तक ले जाने के लिए तैयार हैं।

