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“पितृसत्तात्मक प्रवृति से महिला नेतृत्व को बड़ा संकट” – प्रॉक्सी नेत्रत्व पर सरकार सख्त

पंचायत राज की इस गलत परंपरा को वेब सीरीज "पंचायत" में भी दिखाया गया है. इसमें "फुलेरा " गांव की प्रधान महिला होती है लेकिन उनके पति का प्रभाव और दखलअंदाजी ग्राम पंचायत की गतिविधियों एवं निर्णय में आसानी से देखा जा सकता है.
By वीरेंद्र कुमार जाटवMarch 9, 2025Updated:March 9, 20253 Mins Read
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भारत में पंचायत राज को मजबूत करने के लिए संविधान में सन 1992 में संविधान संशोधन किया गया था. जिसके माध्यम से ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद में महिलाओं के लिए सीट आरक्षित की गई थी. पहले यह 33% थी लेकिन अब अधिकांश राज्यों में यह 50% हो गई है.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी पंचायत राज के प्रभावी क्रियान्वयन के पक्षधर थे. इस व्यवस्था का एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि यदि महिला का निर्वाचन प्रधान या पंचायत समिति या जिला पंचायत परिषद में होता है तो पत्नी एवज में उनके पति अथवा परिवार के पुरुष ही सारा कार्यभार संभालते थे. यहां तक की स्वतंत्रता दिवस पर झंडा रोहण कार्यक्रम में भी प्रधान पतियों की भूमिका देखी गई है.

अब केंद्र सरकार का पंचायत राज मंत्रालय इस संदर्भ में कड़े कानून बनाने जा रहा है. सन 2023 में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दिए आदेश के अनुसार केंद्र सरकार के पंचायती राज मंत्रालय के द्वारा एक समिति की सिफारिश के अनुरूप भारी दंड का प्रावधान किया जाएगा. इन सभी संस्थाओं के कार्यक्रमों का वीडियोग्राफी कराई जाएगी एवं अनेक ऐसे उपाय किए जाएंगे ताकि प्रोक्सी पावर की परंपरा को पूरी तरह समाप्त किया जाए.

पंचायत राज की इस गलत परंपरा को वेब सीरीज “पंचायत” में भी दिखाया गया है. इसमें “फुलेरा ” गांव की प्रधान महिला होती है लेकिन उनके पति का प्रभाव और दखलअंदाजी ग्राम पंचायत की गतिविधियों एवं निर्णय में आसानी से देखा जा सकता है. अधिकांश पंचायत में चाहे गांव के स्तर पर हो, ब्लॉक स्तर पर हो अथवा जिला स्तर पर हो, एक कड़वी हकीकत है. अभी छत्तीसगढ़ में एक मामला सामने आया है कि एक पंचायत में 6 महिला सरपंच निर्वाचित होती है, लेकिन शपथ उनके पतियों के द्वारा ली जाती है.

इस संदर्भ में सरकार के द्वारा कार्रवाई भी की गई है. इस कड़वी हकीकत के रोकथाम के लिए राज्य सरकारों को कड़े प्रावधान रखने होंगे, निगरानी तंत्र को मजबूत करना होगा. कमेटी के सिफारिश के अनुसार लोकपाल की नियुक्ति करनी होगी. तब कहीं जाकर इस व्यवस्था को काबू किया जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा अक्सर देखा जाता है कि प्रधान पत्नियों की जगह प्रधान पति की भूमिका बड़ी हो जाती है.जबकि महिला प्रधान गांव में चौका चूल्हा तक सीमित रह जाती है.

अक्सर प्रधान पतियों के द्वारा बचाव में कहा जाता है कि चूंकि निर्वाचित महिला अनपढ़ है या समय का आभाव है इसलिए उनकी एवज में पुरुषों को आना पड़ता है एकदम अतार्किक है. केंद्र सरकार के पंचायत राज मंत्रालय के द्वारा का ये कदम स्वागत योग्य है. हालांकि है देर से लिया गया कदम है. लेकिन इसको मजबूती एवं प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी है. केंद्र के पंचायत राज मंत्रालय के सख्त कदमों के कारण हम उम्मीद कर सकते हैं कि इस व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा और निर्वाचित महिला भी अपने अधिकारों को समझेंगे. अपने जिम्मेदारियां को समझेंगे और सरकारी संस्थाएं भी इस गलत परंपरा को और प्रोक्सी नेतृत्व का खत्म करने में कामयाब होगी।

by men fulera ministry panchayat panchayti patriarchy proxy raj rule
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वीरेंद्र कुमार जाटव
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वीरेन्द्र कुमार जाटव दिल्ली सरकार के पर्यटन विभाग से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्होंने अपने सेवा काल के दौरान प्रशासनिक दक्षता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता का परिचय दिया। वे लंबे समय तक अनुसूचित जाति-जनजाति कर्मचारी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर निरंतर संघर्षरत रहे। वर्तमान में वे विभिन्न सामाजिक एवं कर्मचारी संगठनों में वरिष्ठ पदों पर दायित्व निभा रहे हैं। एक प्रतिबद्ध अम्बेडकरवादी चिंतक के रूप में वे दलित समाज की समस्याओं, सामाजिक समानता और राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीरता से विचार रखते हैं। उनके लेख देश के प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं, जिनके माध्यम से वे समाज को जागरूक करने और सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

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