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Home » महाबोधि विहार मैनेजमेंट कमेटी में संशोधन की मांग, बौद्ध संगठनों का आंदोलन जारी
राष्ट्रीय

महाबोधि विहार मैनेजमेंट कमेटी में संशोधन की मांग, बौद्ध संगठनों का आंदोलन जारी

महाबोधि विहार को पूरी तरह बौद्धों को सौंपने की यह मांग 18वीं सदी से उठती रही है। 1890-91 में श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु अनागरिक धम्मपाल ने भी इस मुद्दे को उठाया था। 1949 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में यह एक्ट अस्तित्व में आया, तभी से इस पर बौद्ध संगठनों की आपत्ति रही है।
By वीरेंद्र कुमार जाटवMarch 12, 2025Updated:March 13, 20253 Mins Read
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बौद्ध धर्म के अनुयायियों में महाबोधि मंदिर एक्ट 1949 को लेकर दशकों से असंतोष देखा गया है। इस एक्ट के तहत महाबोधि विहार मैनेजमेंट कमेटी में हिंदू धर्म के चार प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है, जबकि अध्यक्ष पद पर गया के जिलाधिकारी को नियुक्त किया जाता है, जो आमतौर पर हिंदू होते हैं।

अब, 12 फरवरी 2025 से देशभर के बौद्ध संगठन इस एक्ट में संशोधन की मांग को लेकर बोधगया में शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग है कि मैनेजमेंट कमेटी के सभी नौ सदस्यों को बौद्ध धर्म से मनोनीत किया जाए।

तीन दशक पुरानी मांग को लेकर तेज हुआ आंदोलन

महाबोधि विहार को पूरी तरह बौद्धों को सौंपने की यह मांग 18वीं सदी से उठती रही है। 1890-91 में श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु अनागरिक धम्मपाल ने भी इस मुद्दे को उठाया था। 1949 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में यह एक्ट अस्तित्व में आया, तभी से इस पर बौद्ध संगठनों की आपत्ति रही है।

बिहार सरकार ने कुछ साल पहले इसमें आंशिक संशोधन किया था, जिसके तहत अब गया के जिलाधिकारी का हिंदू होना अनिवार्य नहीं है। इसके बावजूद, मैनेजमेंट कमेटी में हिंदू प्रतिनिधियों की मौजूदगी को लेकर असंतोष जारी है।

महाबोधि विहार का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

महाबोधि विहार दुनिया भर के बौद्ध अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। यही वह स्थान है, जहां ईसा पूर्व 260 में गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसे वर्ष 2002 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी थी।

ऐतिहासिक रूप से, सम्राट अशोक ने इस विहार का निर्माण कराया था। हालांकि, मुस्लिम आक्रांताओं के हमले में इसे नष्ट कर दिया गया था। बाद में, अनागरिक धम्मपाल के प्रयासों से इसे पुनर्जीवित किया गया।

राजनीतिक दलों और सरकार पर दबाव

महाबोधि विहार को पूरी तरह बौद्ध अनुयायियों को सौंपने की मांग अब राष्ट्रीय स्तर पर गूंजने लगी है। दिल्ली सहित कई राज्यों में बौद्ध संगठन इस आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं, और अगर यह मुद्दा बड़ा रूप लेता है, तो नीतीश कुमार सरकार के लिए चुनौती बन सकता है।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी (BSP), लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसे दलों पर भी दबाव बढ़ रहा है कि वे इस पर अपना रुख स्पष्ट करें।

समता सैनिक दल और अन्य संगठनों की भागीदारी

समता सैनिक दल ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया है। दल के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष भगवान दास सुजात और राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता डॉ. ए. आर. जोशी के नेतृत्व में एक टीम बोधगया पहुंची है।

डॉ. जोशी का मानना है कि इस आंदोलन के समाधान के लिए बिहार के मुख्यमंत्री को आगे आकर प्रदर्शनकारियों से संवाद करना चाहिए। उनका कहना है कि अगर सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठाती है, तो यह आंदोलन और तेज हो सकता है।

आंदोलन का भविष्य और संभावित असर

फिलहाल, प्रशासन ने महाबोधि विहार परिसर से प्रदर्शनकारियों को हटा दिया है और अब धरना स्थल मंदिर से दो किलोमीटर दूर स्थानांतरित कर दिया गया है।

बावजूद इसके, प्रदर्शनकारियों का हौसला बुलंद है। हर दिन हजारों की संख्या में बौद्ध अनुयायी धरने में शामिल हो रहे हैं। आंदोलन को शिक्षकों, वकीलों, छात्रों और अन्य सामाजिक संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है।

अगर यह आंदोलन और व्यापक होता है, तो बिहार चुनाव और राष्ट्रीय स्तर पर भी बौद्ध समुदाय की मांगों को नया राजनीतिक एजेंडा मिल सकता है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है और क्या यह आंदोलन अपने लक्ष्य तक पहुंच पाता है या नहीं।

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वीरेंद्र कुमार जाटव
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