अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी एवं भारत हॉकी की आन बान शान पदमश्री एवं अर्जुन अवार्ड विजेता वंदना कटारिया ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास लेकर सबको चौंका दिया है। वंदना कटारिया 2009 में भारत की टीम का हिस्सा बनी थी और अपने 15 वर्ष के करियर में 320 प्रतिस्पर्धा में 158 गोल करने का कीर्तिमान स्थापित किया था। टोक्यो ओलंपिक 2020 में वंदना कटारिया ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ हैट्रिक लगा कर भारत को शानदार जीत दिलाई थी। वह हॉकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में हैट्रिक लगाने वाली देश की एकमात्र और प्रथम खिलाड़ी हैं। उन्होंने एशियाई गेम्स कॉमनवेल्थ गेम्स वर्ल्ड हॉकी कप में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। अनेकों अवसर पर भारत को शानदार जीत दिलाई थी और भारत का नाम रोशन किया है।
विषम परिस्थितियों में बनायीं अंतर्राष्ट्रीय पहचान
वंदना कटारिया ने बेहद विषम परिस्थितियों में हॉकी खेल जगत में एक अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। इस महान उपलब्धि के पीछे हॉकी खिलाड़ी के परिवार की बड़ी भूमिका रही जिन्होंने गरीबी और गांव में रहकर वन्दना कटारिया को मानसिक रूप से मजबूत किया और लखनऊ स्पोर्ट्स हॉस्टल में भर्ती कर एक बड़ी जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद वंदना कटारिया ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक हॉकी खिलाड़ी के रूप में शानदार कलात्मक हॉकी का परिचय देते हुए भारत की सीनियर टीम में महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया।

यह कल्पना से परे है कि एक खो खो खिलाड़ी ने हॉकी में पदार्पण कर ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है। यही कारण है कि भारत के राष्ट्रपति के द्वारा वंदना कटारिया को अर्जुन अवार्ड एवं पदम श्री से नवाजा गया है। इतना ही नहीं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की एंबेसडर नियुक्त करते हुए उनकी महान उपलब्धियों पर मोहर लगाई है।
संन्यास से परिवार और फैन्स हुए भावुक
वंदना कटारिया के अनुसार वह हॉकी से जुड़ी रहेंगी और भारत में हॉकी लीग प्रतिस्पर्धा होती है तो उसमें जरूर शामिल होकर हॉकी को बढ़ावा देती रहेंगी। वंदना कटारिया ने संन्यास के समय भावुक होकर अपने दिवंगत पिता को भी याद किया था एवम साथी खिलाड़ियों और टीम के कोच प्रबंधकों को भी शुक्रिया अदा किया है। इससे प्रतीत होता है कि वह बेहद लोकप्रिय थीं और अपने कोच एवं प्रबंधकों से अपार स्नेह मिला है।
झेलना पड़ा जातिवाद का गहरा दंश
एक अवसर ऐसा भी आया था जब वन्दना कटारिया को उपेक्षित समाज में जन्म लेने का दंश भी झेलना पड़ा था। जिसका उन्होंने धैर्य और साहस के साथ सामना किया था। यह घटनाक्रम 4 अगस्त 2021 का है। हॉकी खिलाड़ी के हरिद्वार स्थित घर पर कुछ जातिवादी तत्वों ने हमला किया था और ऐसा माहौल बनाया था कि एक मैच में मिली भारत की हार का ठीकरा वंदना कटारिया पर फोड़ना चाह रहे थे। इस प्रकरण पर उत्तराखंड सरकार ने वंदना कटारिया का साथ दिया था। इस देश का कड़वा सच है कि उपेक्षित समाज का कोई भी व्यक्ति कितना भी बड़ा बन जाए लेकिन जाति का भेदभाव और उत्पीड़न सामने आ ही जाता है।
सन्यास से करना चाहिए पुनर्विचार
लेकिन मात्र 32 वर्ष की उम्र में लिए गए संन्यास पर वंदना कटारिया को जरूर पुनर्विचार करना चाहिए। अभी उनके जीवन में हॉकी बाकी है और पांच वर्ष शानदार खेल का प्रदर्शन कर सकती हैं। अभी उनकी हॉकी में किसी भी तरह की कमजोरी नहीं है बल्कि फॉरवर्ड के रूप में वह मुस्तैदी के साथ विरोधी टीमों का मुकाबला कर सकती हैं। भारत के खेल मंत्रालय और हॉकी इंडिया प्रबंधन को भी इस संदर्भ में विचार करना चाहिए और वंदना कटारिया की वापसी सुनिश्चित करनी चाहिए।

