बौद्ध समुदाय का मानना है कि ये रत्न “बुद्ध की उपस्थिति से ओतप्रोत” हैं और इन्हें बाजार में बेचना अनैतिक है। कई बौद्ध मठाधीशों और विद्वानों ने भी इस नीलामी की निंदा की है।
दिल्ली, 5 मई 2025: भगवान बुद्ध के पवित्र रत्न अवशेषों की नीलामी को लेकर विश्व भर में बौद्ध समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। ये रत्न, जो भारत के पिपरहवा (उत्तर प्रदेश) में 1898 में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान खुदाई के समय बुद्ध के अवशेषों के साथ दफन पाए गए थे, अब अंतरराष्ट्रीय नीलामी हाउस सोथबीज़ द्वारा हांगकांग में नीलाम किए जा रहे हैं। इस कदम को बौद्ध समुदाय ने “आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की चोरी” करार देते हुए इसे औपनिवेशिक हिंसा की निरंतरता बताया है। बौद्ध अनुयायी और सामाजिक कार्यकर्ता इस नीलामी को रोकने के लिए भारत सरकार और बौद्ध राष्ट्रों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।
सूरज कुमार बौद्ध (@SurajKrBauddh) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने लिखा, “यह अत्यंत शर्म और दुख की बात है कि भगवान बुद्ध के पवित्र रत्न, जो पिपरहवा में उनके अवशेषों के साथ दफन किए गए थे, अब नीलामी के लिए रखे गए हैं। ये रत्न केवल पुरातात्विक वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि विश्व भर के लाखों बौद्धों के लिए आस्था का प्रतीक हैं। मैं इस कदम की कड़ी निंदा करता हूं। यह बिक्री नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विरासत की चोरी और औपनिवेशिक हिंसा की निरंतरता है। मैं भारत सरकार और सभी बौद्ध राष्ट्रों व समुदायों से विनम्र और तत्काल अपील करता हूं कि वे अपनी आवाज उठाएं और बिना देरी के हस्तक्षेप करें। इन पवित्र रत्नों को सम्मान के साथ संरक्षित किया जाना चाहिए, न कि संपत्ति की तरह बेचा जाना चाहिए। भगवान बुद्ध के पवित्र रत्न अवशेष बौद्ध समुदाय के हैं, इन्हें सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को नहीं बेचा जाना चाहिए। इस बिक्री को तुरंत रोका जाना चाहिए।”
इन रत्नों का इतिहास 1898 तक जाता है, जब ब्रिटिश औपनिवेशिक इंजीनियर और जमींदार विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने पिपरहवा में एक प्राचीन बौद्ध स्तूप की खुदाई की थी। इस खुदाई में एक अवशेष कलश मिला, जिस पर एक शिलालेख के अनुसार, इसमें गौतम बुद्ध के पवित्र अवशेष थे। इन रत्नों को बुद्ध के अवशेषों के सम्मान में दफन किया गया था और इन्हें बौद्ध समुदाय में अत्यंत पवित्र माना जाता है। उस समय ब्रिटिश सरकार ने इनमें से अधिकांश रत्नों को कोलकाता के औपनिवेशिक संग्रहालय में रखा, जबकि पेप्पे को इनमें से लगभग एक-पांचवां हिस्सा रखने की अनुमति दी गई। अब पेप्पे के वंशज इन रत्नों को सोथबीज़ के माध्यम से नीलाम कर रहे हैं।
इस नीलामी के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ताओं और बौद्ध अनुयायियों ने अपनी आवाज बुलंद की है। नितिन मेश्राम (@nitinmeshram_) ने लिखा, “जब तक भारत सरकार इस नीलामी को नहीं रोकती, तब तक इसे लेकर ट्वीट करते रहें। हमें अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को बचाना होगा। यह सिर्फ रत्नों की नीलामी नहीं है, बल्कि हमारी आस्था और इतिहास पर हमला है। हमें एकजुट होकर इस नीलामी को रुकवाना होगा, चाहे इसके लिए कितना भी संघर्ष करना पड़े। भारत सरकार को तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और इन पवित्र अवशेषों को वापस लाने की पहल करनी चाहिए।”
प्रकाश अंबेडकर (@Prksh_Ambedkar) ने इस नीलामी को बौद्ध समुदाय के लिए अपमानजनक बताते हुए कहा, “यह बौद्ध समुदाय के प्रति अपमान है। भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को नीलाम करना हमारी आस्था पर हमला है। यह रत्न बौद्धों की आस्था का हिस्सा हैं, इन्हें बाजार में बेचना पूरी तरह से अनैतिक है। सोथबीज़ को इस नीलामी को तुरंत रोकना चाहिए और इन रत्नों को बौद्ध समुदाय को सौंप देना चाहिए। हमें अपनी आवाज को और तेज करना होगा ताकि इस अपमान को रोका जा सके।”
अरविंद कुमार (@arvind_kumar__) ने भी इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने लिखा, “क्या भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को बाजार में बेचने का अधिकार किसी को है? यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है, इसे संरक्षित करना हमारा कर्तव्य है। इन रत्नों को नीलाम करना सिर्फ अनैतिक ही नहीं, बल्कि हमारी आस्था और इतिहास को अपमानित करने वाला कदम है। भारत सरकार को तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और इन रत्नों को वापस लाकर इन्हें संरक्षित करना चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी धरोहर को बचाएं।”
रजत मौर्या (@Therajatmourya) ने इस नीलामी को अनैतिक और अपमानजनक करार देते हुए कहा, “सोथबीज़ को इस तरह की नीलामी से पहले बौद्ध समुदाय की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए था। यह नीलामी तुरंत रुकनी चाहिए। भगवान बुद्ध के रत्न अवशेष बौद्ध समुदाय की आस्था का प्रतीक हैं, इन्हें बाजार में बेचना पूरी तरह से अनैतिक और अपमानजनक है। सोथबीज़ को अपनी गलती सुधारनी चाहिए और इन रत्नों को बौद्ध समुदाय को सौंप देना चाहिए। हमें इस नीलामी को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।”
बौद्ध समुदाय का मानना है कि ये रत्न “बुद्ध की उपस्थिति से ओतप्रोत” हैं और इन्हें बाजार में बेचना अनैतिक है। कई बौद्ध मठाधीशों और विद्वानों ने भी इस नीलामी की निंदा की है। कंबोडिया के महानिकाय बौद्ध संगठन के प्रमुख, वेनरेबल डॉ. योन सेंग यीथ ने कहा कि यह नीलामी “वैश्विक आध्यात्मिक परंपरा का अनादर करती है और इस बढ़ते आम सहमति को नजरअंदाज करती है कि पवित्र विरासत उन समुदायों की होनी चाहिए जो इसे सबसे अधिक महत्व देते हैं।”
सोथबीज़ ने इस नीलामी को “पारदर्शी और निष्पक्ष” बताते हुए कहा है कि ये रत्न “धार्मिक, पुरातात्विक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अद्वितीय” हैं। हालांकि, बौद्ध समुदाय इसे औपनिवेशिक लूट का हिस्सा मानता है और इसे रोकने की मांग कर रहा है। सवाल यह है कि क्या इन पवित्र अवशेषों को बाजार में बेचा जा सकता है, या इन्हें बौद्ध समुदाय को वापस सौंपा जाना चाहिए? इस मामले में भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका अब अहम हो गई है।

