पूर्वी दिल्ली के दिलशाद गार्डन इलाके के सुंदर नगरी एमसीडी कॉलोनी के 33 वर्षीय निवासी राहुल हर रोज की तरह सुबह अपने घर से काम पर निकले थे। उनके परिवार जनों को लग रहा था कि शाम को राहुल लौट कर अपने घर आ जाएगा। लेकिन 33 वर्षीय सफाई कर्मी राहुल कानून की उड़ती धज्जियां और देश की राजधानी दिल्ली की लचर व्यवस्था का शिकार हो गया।
दिल्ली के दिलशाद गार्डन में पीडब्ल्यूडी ठेकेदार के साथ काम करने वाले सफाई कर्मचारी राहुल की सोमवार 30 मार्च को नाले में डूब कर मौत हो गई। यह मुद्दा सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानवीय गरिमा से जुड़ा हुआ है। आज भी कुछ वर्गों के लोग खतरनाक परिस्थितियों में बिना पर्याप्त सुरक्षा के सीवर और गटर में उतरने को मजबूर हैं। केंद्र सरकार ने “प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऐज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013” लागू किया है और समय-समय पर ‘स्वच्छ भारत मिशन’ तथा मैकेनाइज्ड क्लीनिंग को बढ़ावा देने की बात कही जाति है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेज़वाडा विल्सन ने बताया है कि 2026 के शुरुआती 80 दिनों में ही सीवर में 41 सफाई कर्मियों की मौत हो गई। जबकि 2025 में 121 सफाई कर्मियों की गटर में मौत हुई थी, लेकिन सरकारी आंकड़ा केवल 46 था। बेज़वाड़ा विल्सन ने 25 मार्च को जंतर मंतर पर इस मुद्दे पर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन भी किया था।
जमीनी हकीकत और व्यवस्था की विफलताएं
इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि कई स्थानों पर अभी भी मशीनों की कमी, रखरखाव की समस्या, ठेकेदारी प्रथा और निगरानी की कमजोर व्यवस्था के कारण मजदूरों को सीधे सीवर में उतरना पड़ता है। जब तक ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक बदलाव एक साथ नहीं आएंगे तब तक इस तरह की दुखद घटनाएं रुकना मुश्किल है। इसके साथ ही यह समस्या सामाजिक संरचना से भी जुड़ी हुई है जहां परंपरागत रूप से कुछ समुदायों को इस काम में धकेला गया और उनके लिए वैकल्पिक रोजगार, शिक्षा और सामाजिक उन्नयन के अवसर सीमित रहे, परिणामस्वरूप यह खतरनाक पेशा आज भी जारी है।
कानून से आगे: क्रियान्वयन और तकनीकी समाधान की जरूरत
दिलशाद गार्डन जैसी घटनाएं यह दर्शाती हैं कि केवल कानून बना देना या दिशा-निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन, सख्त निगरानी, और जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता है, साथ ही तकनीकी समाधान जैसे रोबोटिक सीवर क्लीनिंग, हाई-प्रेशर जेटिंग मशीनें और आधुनिक उपकरणों का व्यापक स्तर पर उपयोग सुनिश्चित करना होगा ताकि मानव हस्तक्षेप पूरी तरह समाप्त किया जा सके, इसके अलावा सफाई कर्मचारियों के लिए बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएं, स्थायी रोजगार, उचित वेतन और उनके परिवारों के लिए शिक्षा व पुनर्वास योजनाएं भी उतनी ही जरूरी हैं।
मानवीय गरिमा का सवाल और सामाजिक दृष्टिकोण
समाज के स्तर पर भी इस मुद्दे को केवल एक प्रशासनिक समस्या के रूप में नहीं बल्कि मानवीय गरिमा के प्रश्न के रूप में देखने की जरूरत है, जब तक ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक बदलाव एक साथ नहीं आएंगे तब तक इस तरह की दुखद घटनाएं रुकना मुश्किल है और हर नई घटना हमें यह याद दिलाती रहेगी कि विकास के दावों के बावजूद कुछ बुनियादी मानवीय समस्याएं अभी भी अधूरी हैं।
मौत के मुख्य कारण और कार्यस्थल की लापरवाही
सफाई कर्मचारियों की मौत मुख्य रूप से नाले, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैसों से दम घुटने या फिसलकर गिरने के कारण होते हैं। इनमें ज्यादातर मामलों में मजदूरों को बिना सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण या उचित मशीनरी के काम पर लगाया जाता है, जिससे लापरवाही साफ झलकती है।
अशोक विहार (सितंबर 2025) की घटना
एक प्रमुख घटना सितंबर 2025 में अशोक विहार फेज-II में हुई, जहां 40 वर्षीय अरविंद नामक मजदूर सीवर साफ करते समय फिसलकर गिर गया और जहरीली गैस से बेहोश हो गया। तीन अन्य साथी मजदूर सोनू, नारायण और नरेश उसे बचाने उतरे तो वे भी प्रभावित हुए। अरविंद की अस्पताल पहुंचते-पहुंचते मौत हो गई जबकि बाकी तीन गंभीर हालत में थे।
नरेला (फरवरी 2025) की घटना
फरवरी 2025 में नरेला के मानसा देवी अपार्टमेंट्स के पास दो सफाई कर्मचारी सीवर की सफाई करते समय जहरीली गैस से बेहोश हो गए और उनकी मौत हो गई, जबकि एक अन्य गंभीर रूप से घायल हुआ। ये मजदूर निजी ठेकेदार के अधीन काम कर रहे थे और उनके पास कोई सुरक्षा किट नहीं थी।
सरोजिनी नगर और आनंद विहार (2024) की घटनाएं
अक्टूबर 2024 में सरोजिनी नगर के पिल्लांजी गांव में एक निर्माण स्थल पर सीवर की सफाई के दौरान दो मजदूरों की मौत हो गई। नवंबर 2024 में आनंद विहार के राजधानी एन्क्लेव में दिल्ली जल बोर्ड के इंटरसेप्टर चैंबर में 24 वर्षीय सुरज लोहार नामक कर्मचारी 21 फुट गहरे चैंबर में बिना सुरक्षा के काम करते हुए मृत पाया गया। वह मूल रूप से सुरक्षा गार्ड था लेकिन सफाई का काम करने को मजबूर किया गया था।
रोहिणी (मई 2024) की घटना
मई 2024 में रोहिणी के डी मॉल के बाहर सेप्टिक टैंक साफ करते समय हरे कृष्ण प्रसाद (32 वर्ष) और सागर (20 वर्ष) बेहोश हुए और अस्पताल में उनकी मौत हो गई। इन्हें भी बिना सुरक्षा गियर के काम पर लगाया गया था।
कड़कड़दुमा (फरवरी 2020) की घटना
फरवरी 2020 में कड़कड़दुमा के सीबीडी ग्राउंड पर 25 वर्षीय रवि नामक दिहाड़ी मजदूर 15-20 फुट गहरे सीवर में उतरा तो जहरीली गैस से बेहोश हो गया। ठेकेदार ने दूसरे मजदूर संजय को जबरन उतारा, जिससे रवि की मौत हो गई और संजय गंभीर रूप से बीमार पड़ गए।
अन्य हालिया घटनाएं: न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी और पश्चिम विहार
इन घटनाओं के अलावा मार्च 2025 में न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में पंथ लाल चंद्रा (43 वर्ष) समेत तीन मजदूरों की मौत एक मैनहोल में जहरीली गैस से हुई। जुलाई 2025 में पश्चिम विहार के श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट में दो मजदूर बृजेश (26) और विक्रम (30) सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट साफ करते समय मारे गए।
दिल्ली में पिछले वर्षों में दर्जनों ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनमें 2017 से अब तक 40 से अधिक मौतें आधिकारिक रूप से दर्ज हैं। अधिकांश मामलों में ठेकेदारों की लापरवाही, मशीनीकृत सफाई की कमी और सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के बावजूद मैनुअल सफाई जारी रहना मुख्य कारण हैं। इन हादसों से परिवार आर्थिक संकट और भावनात्मक आघात झेलते हैं, जबकि दोषियों पर सख्त कार्रवाई और मुआवजे की प्रक्रिया अक्सर लंबी खिंच जाती है। सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, उचित उपकरण उपलब्ध कराने और मशीनी सफाई को अनिवार्य बनाने की जरूरत कितनी तीव्र है, ताकि शहर की स्वच्छता बनाए रखने वाले इन अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं की जान बेकार न जाए।

