हरियाणा की नायब सैनी सरकार ने एक अप्रत्याशित फैसला लेते हुए अपनी प्रथम कैबिनेट बैठक में ही सुप्रीम कोर्ट के 1 अगस्त के फैसले के अनुरूप वर्गीकरण व्यवस्था को अनुसूचित जाति आरक्षण में लागू कर दिया है।
यह हरियाणा सरकार के लिए ऐतिहासिक फैसला हो सकता है लेकिन यह कदम सभी वंचित वर्गों को नौकरी सुनिश्चित करेगा यह कभी संभव नहीं सकता।
हरियाणा सरकार का मानना है कि जो अनुसूचित जातियां पीछे छूट गई हैं उनके लिए कोटा में कोटा की व्यवस्था की गई है. सरकार का मानना है कि इस तरह से वंचित समाज को नौकरी में अवसर मिलेंगे और वह समाज के मुख्य धारा से जुड़ने में कामयाब होंगे। हालांकि, इसमें सरकार को कितनी कामयाबी मिलेगी,यह आने वाला वक्त ही बात पाएगा।
हरियाणा सरकार के निर्णय के विरोध में मायावती ने अपने ट्वीट जारी करके जोरदार विरोध दर्ज किया है। उन्होंने भाजपा और हरियाणा सरकार पर दलितों को बांटने का बड़ा आरोप लगाया है। मायावती ने कहा है कि यदि अनुसूचित जाति वर्ग में विभाजन होता है तो यह वर्ग राजनीति में कभी दखल नहीं कर सकता है।
एक तरफ राज्य सरकार और केंद्र सरकार “नॉट फाउंड सूटेबल” का टैग लगाकर एससी वर्ग की रिक्तियां ही नहीं भरी जाती हैं, वहीं ‘आउटसोर्स’ के कारण आरक्षण की व्यवस्था स्वत: ही कमजोर होती जा रही है। यही कारण है कि आरक्षित वर्ग की सभी आरक्षित जातियों में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी है। यहां यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि इस व्यवस्था के लागू होने के बावजूद भी क्या हरियाणा सरकार अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित साढ़े 22 प्रतिशत कोटा सुनिश्चित कर पाएगी?
यह कड़वा सत्य है कि आजादी के 70 वर्ष बाद केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के संस्थानों ने आरक्षण कोटा का कभी पूरा नहीं किया है. यह भी स्पष्ट है कि आरक्षण आधारित नौकरियां बेहद कम हैं क्योंकि सरकार निजीकरण एवं आउटसोर्स के माध्यम से नौकरियां की भर्ती करती है जिसमें आरक्षण की व्यवस्था नहीं होती. इसलिए आरक्षण समर्थकों के द्वारा निजी क्षेत्र में आरक्षण को लागू करने की मांग भी जोरदार ढंग से उठाई जाती रही है. केन्द्र सरकार का ध्यान इस तरफ बिल्कुल भी नहीं है और केंद्र सरकार की कोई पहल भी नहीं है इस संदर्भ में।
राज्य सरकारों को संविदा आधारित नौकरियों में आरक्षण को लागू कर सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करना चाहिए अन्यथा यह वर्गीकरण की व्यवस्था भी कागजों में सिमटकर रह जाएगी. वास्तविक धरातल में देखा जाए तो यह संभव ही नहीं है ।
अनेकों दलों ने इस व्यवस्था का विरोध भी किया है जिसमे बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, आजाद समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल आदि शमिल हैं। इन दलों का मानना है कि आरक्षण में वर्गीकरण लागु करने का एकमात्र कारण अनुसूचित जाति की एकता को विखंडित करना है. इन सभी दलों का यह भी तर्क है कि जाति जनगणना हो जिसमें यह सुनिश्चित हो सके कि किस वर्ग की नौकरियों में कितना आनुपातिक प्रतिनिधित्व है.
आरक्षण का वर्गीकरण इतना पेचीदा विषय है जिस पर आज तक अनेकों राजनीतिक दलों ने अपनी आवाज नहीं खोली है. लेकिन हरियाणा की सरकार के द्वारा यह आदेश जारी करने से स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा इसके पक्ष में है. कांग्रेस ने अभी तक इस मुद्दे पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन यदि तेलंगाना में भी यह नियम लागू हो जाता है तो निश्चित रूप से कांग्रेस इसके पक्ष में खड़ी दिखाई देगी।

